एक सुंदर से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत ही कुशल चित्रकार था। उसी गाँव में विक्रम नाम का एक युवक भी रहता था। विक्रम को कला से ज़्यादा इस बात की चिंता रहती थी कि लोग उसकी प्रशंसा करें। वह हमेशा डींगें मारता था कि वह बहुत बड़ा कलाकार है, जबकि उसके चित्र साधारण थे।
एक बार गाँव में चित्रकला प्रतियोगिता हुई। अर्जुन ने अपनी मेहनत से एक बहुत ही सुंदर चित्र बनाया। वहीं विक्रम ने एक मामूली सा चित्र बनाया और पूरे समय यही कहता रहा कि जीत तो उसी की होगी। जब परिणाम आया, तो अर्जुन विजेता घोषित हुआ। यह देखकर विक्रम गुस्से से लाल हो गया। वह अर्जुन के पास गया और चिल्लाकर बोला, 'तुमने बेईमानी की है! तुम एक बुरे कलाकार हो!'
वहाँ खड़े एक बुजुर्ग व्यक्ति ने विक्रम को समझाया, 'बेटा, जो लोग तुम्हारी प्रशंसा नहीं कर रहे, उनसे दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। वे तुम्हें इसलिए कमतर नहीं आंक रहे कि वे बुरे हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि तुम्हारे काम में वह बात नहीं है। जो लोग तुम्हें नीचा दिखाते हैं, उनके बारे में सोचकर दुखी होने के बजाय, इस बात पर विचार करो कि तुम प्रशंसा के योग्य क्यों नहीं बन पाए और खुद को बेहतर बनाने का प्रयास करो।' विक्रम को अपनी गलती समझ आ गई। उसने दिखावे की प्रशंसा छोड़ दी और सच में एक अच्छा कलाकार बनने के लिए मेहनत करने लगा।