एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का अपने दादाजी के साथ रहता था। एक दिन गाँव में एक बहुत बड़ा यज्ञ होने वाला था। लोग यज्ञ की तैयारी में जुटे थे, जहाँ पशुओं की बलि दी जानी थी और पवित्र अग्नि में घी चढ़ाया जाना था। अर्जुन के दादाजी भी एक बड़ी पूजा की तैयारी कर रहे थे। लेकिन उस सुबह, जब अर्जुन अपने बगीचे में टहल रहा था, उसने एक छोटा सा मेमना देखा। वह मेमना डर के मारे कांप रहा था।
जब अर्जुन ने धीरे से उस मेमने को छुआ, तो उसे उसके नन्हे दिल की धड़कन महसूस हुई। उसे अहसास हुआ कि उस छोटे से जीव में भी वैसी ही जान है जैसी उसमें है। वह दौड़कर अपने दादाजी के पास गया और पूछा, 'दादाजी, क्या हम भगवान को खुश करने के लिए किसी की जान क्यों लें? क्या हम बिना किसी को नुकसान पहुँचाए भी पूजा नहीं कर सकते?' दादाजी ने उस मेमने की आँखों में देखा और फिर अर्जुन के आँसुओं को। उन्हें समझ आया कि हज़ारों यज्ञों में घी चढ़ाने से कहीं बढ़कर एक जीव की रक्षा करना है। उस दिन के बाद, उन्होंने बलि देने के बजाय दया और सेवा का मार्ग चुना। वह मेमना भी उनके बगीचे में खुशी-खुशी रहने लगा।