एक छोटे से गाँव में कवि नाम का एक लड़का और उसके दादाजी सोमू रहते थे। कवि बहुत ऊर्जावान था, लेकिन उसमें धैर्य की बहुत कमी थी। वह चाहता था कि सब कुछ तुरंत हो जाए।
एक बार गाँव में एक प्रतियोगिता रखी गई। जो बच्चा पूरे दिन बिना बोले और बिना कुछ खाए शांति से बैठ सकेगा, उसे एक सुंदर उपहार दिया जाएगा। कवि बहुत खुश हुआ और बोला, 'दादाजी, यह तो बहुत आसान है, मैं कर लूँगा!'
दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, 'कवि, यह केवल शरीर का खेल नहीं है, यह मन का अनुशासन है। इसके लिए मन की पहले से की गई तैयारी और शक्ति चाहिए।'
प्रतियोगिता शुरू हुई। कवि बड़े जोश के साथ बैठ गया। लेकिन कुछ ही मिनटों में उसे भूख लगने लगी। थोड़ी देर बाद, आसपास के पक्षियों की चहचहाहट भी उसे परेशान करने लगी। उसका मन अशांत हो गया और वह चिढ़ गया। एक घंटा भी बीतने से पहले ही, वह गुस्से में उठकर वहाँ से चला गया।
वहीं दूसरी ओर, अर्जुन नाम का एक लड़का बहुत ही शांति से पूरा दिन बैठा रहा और प्रतियोगिता जीत गया।
कवि उदास होकर दादाजी के पास गया और पूछा, 'दादाजी, मैं क्यों नहीं कर पाया?'
दादाजी ने समझाया, 'बेटा, ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने के लिए पैरों में पहले से ताकत होनी चाहिए। वैसे ही, कठिन तपस्या के लिए मन में पहले से अभ्यास की शक्ति होनी चाहिए। सीधे बड़ी चीज़ों की ओर भागने के बजाय, छोटी-छोटी चीज़ों में धैर्य रखना सीखो।'
कवि समझ गया और उस दिन से उसने धैर्य और अनुशासन का अभ्यास करना शुरू कर दिया।