पहाड़ों के पास बसे एक छोटे से गाँव में आर्यन अपने दादाजी के साथ रहता था। उसके दादाजी बहुत ज्ञानी थे। एक दोपहर, आर्यन एक सुनहरी तितली को पकड़ने के लिए मैदान में दौड़ रहा था। वह जितनी तेज़ दौड़ता, तितली उतनी ही दूर उड़ जाती।
दादाजी ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "आर्यन, तुम जिसे पकड़ने की कोशिश कर रहे हो वह सुंदर तो है, लेकिन वह क्षणभंगुर है। सूरज ढलते ही वह तितली चली जाएगी, और तुम फिर किसी और के पीछे भागोगे।"
आर्यन ने हाँफते हुए पूछा, "तो फिर हमें क्या खोजना चाहिए दादाजी?"
दादाजी उसे एक शांत झील के किनारे ले गए। "इस झील का पानी जब शांत होता है, तभी तुम इसमें अपना चेहरा देख सकते हो। यह संसार वैसा ही है। सुख, दुख और इच्छाएं आती-जाती रहती हैं। लेकिन यदि तुम अपने भीतर के सत्य को और उस परम शांति को पहचान लो, तो तुम इस संसार के मोह-माया के चक्र में फिर कभी नहीं फँसोगे। तुम उस मार्ग पर चलोगे जहाँ से वापस इस भटकन में आने की ज़रूरत नहीं पड़ती।"
उस दिन के बाद से, आर्यन ने केवल बाहरी चीज़ों के पीछे भागना छोड़ दिया और ज्ञान और अच्छे आचरण को अपना लक्ष्य बनाया। उसके मन को एक गहरी शांति मिल गई।