एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का एक लड़का रहता था। उसे नई चीज़ें सीखना बहुत पसंद था, लेकिन जब पढ़ाई कठिन होती, तो वह जल्दी हार मान लेता था। एक दोपहर, उसने अपने दादाजी, माधव को रेत में एक कुआँ खोदते देखा।
थोड़ी खुदाई करने के बाद भी वहाँ सिर्फ सूखी रेत ही निकली। आर्यन ने पूछा, "दादाजी, पानी क्यों नहीं निकल रहा? क्या कुआँ खराब है?"
दादाजी मुस्कुराए और बोले, "नहीं आर्यन, यह रेत का कुआँ है। हम जितनी गहराई तक खुदाई करेंगे, उतना ही अधिक पानी निकलेगा। अगर हम बस ऊपर-ऊपर खोदकर छोड़ देंगे, तो सिर्फ रेत ही मिलेगी। असली पानी गहराई में छिपा है।"
उस शाम, आर्यन अपनी विज्ञान की किताब लेकर बैठा। एक अध्याय उसे बहुत कठिन लगा और उसका मन पढ़ाई छोड़ने का हुआ। तभी उसे दादाजी की बात याद आई। उसने हार नहीं मानी और उस विषय को गहराई से समझने की कोशिश की। उसने बार-बार पढ़ा और सवाल पूछे।
कुछ समय बाद, आर्यन की समझ बहुत बढ़ गई। वह कक्षा में सबसे होशियार छात्र बन गया। जैसे गहरे कुएँ से पानी का प्रवाह बढ़ता है, वैसे ही आर्यन के ज्ञान का प्रवाह भी बढ़ने लगा। उसने समझ लिया कि सीखना भी कुआँ खोदने जैसा है—जितनी गहराई में जाओगे, उतना ही ज्ञान मिलेगा।