एक घने जंगल में कबील नाम का एक खरगोश रहता था। कबील बहुत फुर्तीला था, लेकिन उसमें एक कमी थी—वह हमेशा सबसे ऊपर पहुँचने की जल्दी में रहता था। एक दिन, कबील की नज़र एक विशाल आम के पेड़ पर पड़ी। पेड़ की सबसे ऊँची टहनी पर सुनहरे, पके हुए आम लटक रहे थे।
कबील पेड़ पर चढ़ने लगा। नीचे की टहनियाँ मज़बूत थीं। उसने सोचा, 'अगर मैं थोड़ा और ऊपर चला जाऊँ, तो उन बड़े आमों तक पहुँच जाऊँगा!' उसके समझदार दोस्त, मणिक, ने उसे चेतावनी दी, 'कबील, रुको! तुम पहले ही काफी ऊपर आ गए हो। जहाँ हो वहीं से फल खा लो, और आगे मत बढ़ो, टहनियाँ कमज़ोर हो सकती हैं!'
लेकिन कबील ने उसकी बात नहीं मानी। लालच में आकर वह टहनी के बिल्कुल आखिरी छोर तक पहुँच गया। तभी अचानक हवा का एक झोंका आया और वह पतली टहनी टूट गई। कबील नीचे गिर गया। किस्मत से वह एक झाड़ी में गिरा, जिससे उसकी जान तो बच गई, लेकिन उसके पैर में चोट लग गई। उस दिन कबील ने सीखा कि अपनी सीमा जानना कितना ज़रूरी है।