एक सुंदर घाटी में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसके पिता उस राज्य के राजा के सलाहकार थे। राजा बहुत शक्तिशाली थे, लेकिन वे बहुत क्रोधी स्वभाव के भी थे। छोटी-छोटी बातों पर उनका गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ता था।
एक दिन अर्जुन ने देखा कि राजा उसके पिता पर बहुत चिल्ला रहे हैं। अर्जुन डर गया। उस रात उसने अपने पिता से पूछा, "पिताजी, राजा इतने गुस्से वाले हैं, फिर भी आप इतने शांत कैसे रहते हैं? क्या आपको डर नहीं लगता कि उनका गुस्सा आपको नुकसान पहुँचा सकता है?"
उसके पिता ने एक छोटा दीया जलाया और कहा, "अर्जुन, इस लौ को देखो। यदि तुम आग के बहुत करीब जाओगे, तो तुम्हारा हाथ जल जाएगा। लेकिन यदि तुम बहुत दूर खड़े हो जाओगे, तो तुम्हें इसकी रोशनी और गर्माहट नहीं मिलेगी। एक बुद्धिमान व्यक्ति को आग के पास ऐसे रहना चाहिए कि वह जले नहीं, लेकिन उसकी रोशनी से दूर भी न रहे। ठीक वैसे ही, राजा के पास रहते हुए हमें अपना विवेक और उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए।"
कुछ दिनों बाद, जब राजा एक सभा में बहुत क्रोधित हुए, तो अर्जुन के पिता ने बहुत ही शांत और सम्मानजनक तरीके से अपनी बात रखी। उनके धैर्य से राजा का गुस्सा शांत हो गया। अर्जुन समझ गया कि शक्ति और क्रोध के बीच संतुलन बनाए रखना ही असली बुद्धिमानी है।