एक शांत गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसे बागवानी का बहुत शौक था। उसके पिता, रवि, एक समझदार किसान थे। एक सुबह, अर्जुन अपने बगीचे में एक छोटे से पौधे की देखभाल कर रहा था। वह बड़े चाव से देख रहा था कि कैसे वह नन्हा पौधा धीरे-धीरे सूरज की ओर बढ़ रहा है।
अर्जुन का दोस्त रोहन, जिसे हर बात पर भाषण देने की आदत थी, वहाँ आ गया। अर्जुन को पौधा सींचते देख रोहन बोला, "अर्जुन, तुम गलत तरीके से पानी दे रहे हो! तुम्हें बर्तन को एक खास कोण पर झुकाना चाहिए, वरना जड़ें सड़ सकती हैं!"
अर्जुन को यह सब पहले से पता था। रोहन की लंबी बातों से उसे झुंझलाहट होने लगी।
शाम को जब रवि ने यह देखा, तो उन्होंने अर्जुन को पास बुलाया और बढ़ते हुए पौधे की ओर इशारा करते हुए कहा, "अर्जुन, इस पौधे को देखो। यह खुद बढ़ रहा है। इसे किसी लंबे भाषण की ज़रूरत नहीं है, इसे बस सही समय पर थोड़े से पानी की ज़रूरत है। इंसान भी ऐसे ही होते हैं। जो लोग समझदार होते हैं, उन्हें बार-बार समझाने की ज़रूरत नहीं होती। उन्हें बस सही समय पर एक छोटा सा सुझाव दे दो, वह उनके लिए उस पानी की तरह काम करेगा जो उन्हें और बढ़ने में मदद करता है।"
अर्जुन समझ गया कि समझदार लोगों को उपदेश देने के बजाय, उन्हें बस सही दिशा दिखाना ही काफी है।