बहुत समय पहले की बात है, ऊँचे पहाड़ों के बीच 'मरकतपुरी' नाम का एक भव्य किला था। वह किला देखने में बहुत सुंदर था, उसकी दीवारें बहुत ऊँची थीं और दरवाज़े बहुत विशाल थे। वहाँ के राजा विक्रम को अपने किले पर बहुत गर्व था। लेकिन उस किले में रहने वाले सैनिक और लोग बहुत आलसी हो गए थे। उन्हें अपने कर्तव्यों की कोई चिंता नहीं थी।
एक दिन, दुश्मनों की एक छोटी सी टुकड़ी उस किले की ओर बढ़ी। किले की दीवारें इतनी ऊँची थीं कि सैनिकों ने सोचा, 'हमें कोई खतरा नहीं है,' और वे सो गए। किले के भीतर अनाज के भंडार तो बहुत थे, लेकिन उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं था। अचानक, दुश्मन एक छोटे से रास्ते से किले के अंदर घुस आए। किले की मज़बूत दीवारें उन्हें रोक नहीं पाईं, क्योंकि अंदर के लोग मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं थे।
राजा विक्रम को बहुत दुख हुआ। उन्होंने महसूस किया कि 'किला चाहे कितना भी शानदार क्यों न हो, यदि उसके अंदर रहने वाले लोगों में कर्मठता और साहस नहीं है, तो वह किला केवल पत्थरों का ढेर है।' उस दिन के बाद, राजा ने किले की सुंदरता से ज़्यादा अपने लोगों के कौशल और उनकी तत्परता पर ध्यान देना शुरू किया।