बहुत समय पहले, एक विशाल साम्राज्य में विक्रम नाम का एक साहसी सेनापति रहता था। वह अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध था। एक बार, रुद्र नाम के एक शत्रु राजा ने विक्रम के राज्य पर हमला कर दिया। दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। युद्ध के मैदान में विक्रम ने रुद्र को पराजित कर दिया।
हारने के बाद रुद्र अपने घोड़े से नीचे गिर गया और उसके पैर में गहरी चोट आई। वह दर्द से कराह रहा था। विक्रम के सैनिकों ने कहा, "सेनापति, यह हमारा शत्रु है! इसे अभी समाप्त कर दें, यही आपकी वीरता का प्रमाण होगा!"
विक्रम ने रुद्र की ओर देखा। उसने देखा कि रुद्र एक योद्धा नहीं, बल्कि दर्द से तड़पता हुआ एक साधारण मनुष्य है। विक्रम जानता था कि युद्ध जीतना साहस है, लेकिन वह मानता था कि गिरे हुए शत्रु की मदद करना सबसे बड़ा साहस है। विक्रम ने अपनी तलवार नीचे रख दी और अपने सैनिकों को आदेश दिया, "इसे मारो मत, इसके घावों पर मरहम लगाओ।"
विक्रम ने रुद्र का उपचार करवाया और उसे भोजन दिया। जब रुद्र ठीक हो गया, तो उसने आश्चर्य से पूछा, "आपने मुझे क्यों बचाया? आप तो मुझे मार सकते थे।"
विक्रम ने शांति से उत्तर दिया, "शत्रु को हराना वीरता है, लेकिन संकट में पड़े शत्रु का उपकार करना सच्ची वीरता है।" रुद्र विक्रम की इस महानता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने शत्रुता त्याग दी और दोनों राज्यों में सदा के लिए मित्रता हो गई।