एक सुंदर जंगल में कवि नाम का एक बंदर रहता था। कवि दूसरे बंदरों की तुलना में बहुत तेज़ था और पेड़ों की ऊँची टहनियों से फल आसानी से तोड़ लेता था। इस वजह से उसे बहुत घमंड हो गया था। वह अक्सर कहता, 'मैं इस जंगल का सबसे बुद्धिमान बंदर हूँ!'
एक दिन जंगल में बहुत तेज़ तूफान आया। कई पेड़ गिर गए। जंगल के एक कोने में एक नई बेल उगी थी, जिसकी टहनियाँ बहुत ही उलझी हुई और पेचीदा थीं। दूसरे बंदर उस बेल को छूने से डर रहे थे। लेकिन कवि ने घमंड में कहा, 'तुम सब डरपोक हो, मुझे सब पता है! देखो मैं कैसे तोड़ता हूँ!'
जैसे ही कवि ने फल तोड़ने की कोशिश की, उसे समझ आया कि बेल का जाल बहुत जटिल है। लेकिन अपनी बुद्धिमानी दिखाने के चक्कर में उसने बिना सोचे-समझे एक टहनी को ज़ोर से खींच दिया। अचानक वह बेल टूट गई और कवि धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। उसे चोट तो नहीं लगी, लेकिन उसका अहंकार टूट गया। तभी एक बूढ़े बंदर ने आकर सबको दिखाया कि उस बेल को धीरे-धीरे और समझदारी से कैसे सुलझाया जाता है।
कवि को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि 'मैं सब जानता हूँ' कहना ही असल में अज्ञानता है। उस दिन के बाद से उसने दूसरों से सीखना शुरू कर दिया।