एक छोटे से गाँव में अर्जुन और मीरा नाम के दो मित्र रहते थे। अर्जुन को अपनी ताकत पर बहुत घमंड था, लेकिन उसमें एक कमी थी—वह अपनी गलतियों को कभी स्वीकार नहीं करता था। मीरा शांत स्वभाव की थी, लेकिन वह बहुत ईमानदार थी।
एक बार गाँव में हस्तशिल्प प्रतियोगिता हुई। अर्जुन ने लकड़ी का एक बड़ा रथ बनाने का फैसला किया। जल्दबाजी में काम करते समय, रथ के एक पहिए में एक छोटी सी दरार आ गई। किसी ने उसे देखा नहीं, तो अर्जुन ने सोचा, 'मैं इसे छिपा लूँगा, सब समझेंगे कि मैंने बहुत अच्छा काम किया है।'
दूसरी ओर, मीरा एक छोटी लकड़ी की चिड़िया बना रही थी। जब उसने उसे पूरा किया, तो उसने देखा कि चिड़िया के पंख पर एक छोटा सा निशान है। वह निशान बहुत छोटा था, लेकिन मीरा को अपनी इस गलती पर बहुत शर्म महसूस हुई।
जब जज आए, तो अर्जुन ने बड़े गर्व से अपना रथ दिखाया। लेकिन मीरा जज के पास गई और धीरे से कहा, 'क्षमा करें, मेरी चिड़िया में एक छोटी सी कमी है। मुझे इसे दिखाने में शर्म आ रही है। क्या मैं इसे ठीक करके कल ला सकती हूँ?'
अर्जुन हँसा और बोला, 'मीरा, इसमें शर्म की क्या बात है? कोई नहीं देख रहा!'
लेकिन जज मीरा की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, 'अर्जुन ने कला तो दिखाई, लेकिन उसमें सच्चाई की कमी है। मीरा ने गलती की, लेकिन उस गलती पर शर्मिंदा होना और उसे सुधारने की इच्छा रखना ही असली बड़प्पन है।'
मीरा को उसकी ईमानदारी के लिए पुरस्कृत किया गया। अर्जुन ने उस दिन सीखा कि असली ताकत केवल काम करने में नहीं, बल्कि अपनी गलती को स्वीकार करने के साहस में होती है।