एक सुंदर से गाँव में कविमति नाम की एक छोटी लड़की अपने दादाजी के साथ रहती थी। कविमति को स्वादिष्ट और मीठा खाना बहुत पसंद था। एक दिन उसकी माँ ने बहुत ही स्वादिष्ट पकवान बनाए। कविमति ने बड़े चाव से उन्हें खाया और तुरंत खेलने के लिए दौड़ने लगी।
उसके दादाजी ने उसे प्यार से रोका, "कविमति, जब तक तुम्हें यकीन न हो जाए कि खाना ठीक से पच गया है, तब तक भाग-दौड़ मत करो," उन्होंने समझाया।
कविमति को यह बात समझ नहीं आई। उसने कहा, "दादाजी, मुझे तो बहुत ऊर्जा महसूस हो रही है, मैं खेलने जा रही हूँ!"
दादाजी मुस्कुराए और बोले, "अपने शरीर की सुनो। अगर खाना ठीक से नहीं पचा, तो तुम बाद में कमज़ोर महसूस करोगी। और याद रखना, जब अगली बार तुम्हें बहुत तेज़ भूख लगे, तो केवल अपनी पसंद का ही मत ढूँढना। शरीर के लिए जो भी सादा और पौष्टिक भोजन हो, उसे बिना किसी झिझक के खा लेना चाहिए।"
कुछ दिनों बाद, एक दिन बगीचे में काम करने के बाद कविमति को बहुत तेज़ भूख लगी। जब वह खाने बैठी, तो उसने देखा कि आज उसकी पसंद का कोई पकवान नहीं था, बस सादा दलिया बना था। पहले तो उसे थोड़ा बुरा लगा, लेकिन फिर उसे दादाजी की बात याद आई। उसने सोचा कि भूख लगने पर स्वाद से ज़्यादा शरीर की ज़रूरत ज़रूरी है। उसने बड़े चाव से दलिया खाया। उस रात उसे बहुत अच्छी नींद आई और वह बहुत तरोताज़ा महसूस कर रही थी। उसे समझ आ गया कि सही समय पर पाचन और भूख लगने पर सही भोजन लेना कितना ज़रूरी है।