एक सुंदर से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। वह अपनी कक्षा का सबसे होशियार छात्र था। हर चीज़ में अव्वल आने के कारण उसके मन में थोड़ा अहंकार आ गया था।
एक बार स्कूल में चित्रकला प्रतियोगिता हुई। अर्जुन ने बहुत सुंदर चित्र बनाया। उसके दोस्त कविन ने एक साधारण सा चित्र बनाया। अर्जुन ने कविन का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, 'कविन, तुम्हारा चित्र बहुत ही मामूली है, इसकी तुलना मेरे चित्र से नहीं की जा सकती।'
लेकिन जब विजेताओं की घोषणा हुई, तो कविन को प्रथम पुरस्कार मिला। अर्जुन को बहुत बुरा लगा। उसने अपनी गलती मानने के बजाय ज़िद पकड़ ली और कहा, 'जज गलत हैं, मेरा चित्र ही सबसे अच्छा है!' अपने अहंकार के कारण उसके दोस्त उससे बात करना छोड़ दिए और अर्जुन अकेला पड़ गया।
तभी उसके दादाजी ने उसे समझाया, 'अर्जुन, सच्ची महानता विनम्रता में है। अपनी योग्यता पर गर्व करना अच्छी बात है, लेकिन उस गर्व को अहंकार बनाकर ज़िद करना तुम्हें छोटा बना देता है।' अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने कविन से माफी मांगी और उसके चित्र की प्रशंसा की। उस दिन के बाद से अर्जुन न केवल एक अच्छा कलाकार बना, बल्कि एक अच्छा इंसान भी बना।