एक छोटे से गाँव में माधव नाम का एक किसान अपने बेटे अर्जुन के साथ रहता था। माधव हमेशा अर्जुन को एक बात सिखाता था: 'बेटा, जीवन में कितनी भी मुश्किलें आएँ, पर कभी भी गरीबी के दलदल में मत फंसना।'
एक साल गाँव में भयंकर सूखा पड़ा। फसलें बर्बाद हो गईं और घर की जमापूँजी भी खत्म हो गई। अर्जुन की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए माधव को एक अमीर व्यापारी के गोदाम में काम करना पड़ा। वह व्यापारी बहुत कठोर था। वह अक्सर माधव को अपमानित करता और बहुत कम मजदूरी देता था।
एक शाम, माधव थका हुआ बैठा था। अर्जुन ने पूछा, 'पिताजी, आप यह अपमान क्यों सहते हैं?' माधव ने शांति से कहा, 'अर्जुन, आग के बीच सोना खतरनाक हो सकता है, लेकिन गरीबी के बीच जीना उससे भी ज्यादा भयानक है। आग केवल शरीर को जलाती है, लेकिन गरीबी इंसान के सम्मान और उसकी शांति को जलाकर राख कर देती है। मैं मेहनत कर रहा हूँ ताकि हमें कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।'
माधव की मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे उनका जीवन फिर से पटरी पर आ गया। अर्जुन समझ गया कि शारीरिक कष्ट से कहीं बड़ा दुख गरीबी का होता है।