एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का एक लड़का और उसके पिता रवि रहते थे। रवि एक किसान थे और बहुत ही दयालु स्वभाव के थे। एक शाम, जब वे बाज़ार से गुजर रहे थे, अर्जुन ने देखा कि एक पेड़ के नीचे माधव नाम के एक वृद्ध व्यक्ति चुपचाप बैठे हैं। उनके सामने एक छोटा सा कटोरा रखा था, लेकिन वे किसी से कुछ मांग नहीं रहे थे। वे बस शांति से लोगों को गुजरते हुए देख रहे थे, उनकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
अर्जुन ने अपने पिता से धीरे से पूछा, "पिताजी, वे कुछ माँग क्यों नहीं रहे हैं? वे बहुत भूखे लग रहे हैं।"
रवि ने मुस्कुराते हुए कहा, "अर्जुन, इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो माँगने के लिए शब्दों का सहारा नहीं लेते। वे बस अपनी आँखों से अपनी ज़रूरत बयां कर देते हैं। उनका मौन एक ऐसी पुकार है जिसे केवल एक दयालु हृदय ही सुन सकता है।"
अर्जुन ने माधव की आँखों में देखा। वहाँ एक उम्मीद थी और साथ ही एक गरिमा भी। अर्जुन तुरंत दौड़कर गया और अपने पास रखे कुछ खाने के टुकड़े और एक फल लेकर आया और उन्हें माधव को दे दिया। माधव ने जब भोजन लिया, तो उनकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए। बिना कुछ कहे, केवल अपनी उपस्थिति से मदद पाने के उस अनुभव ने अर्जुन को जीवन का एक बड़ा सबक सिखाया।