एक शांत गाँव में कवि और मीरा नाम के पति-पत्नी रहते थे। कवि एक मूर्तिकार था और मीरा उसकी बहुत प्रिय पत्नी थी। एक बार, काम के सिलसिले में कवि को कुछ महीनों के लिए दूर शहर जाना पड़ा। जाते समय मीरा बहुत उदास थी, उसने कहा, "आप भले ही दूर चले जाएं, पर आपकी यादें मेरे साथ रहेंगी।"
कवि के जाने के कुछ हफ़्तों बाद, मीरा घर के काम कर रही थी कि अचानक उसकी उंगली एक जलते हुए दीये की लौ से छू गई। उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया और सोचा, 'आग तो तभी जलाती है जब उसे छुआ जाए।'
लेकिन उस रात, जब मीरा खिड़की के पास बैठी थी, उसे अपने सीने में एक अजीब सी जलन महसूस हुई। वह आग की जलन नहीं थी, बल्कि कवि की कमी का दर्द था। कवि उसके पास नहीं था, फिर भी उसकी यादें मीरा के हृदय को किसी जलती हुई ज्वाला की तरह तपा रही थीं। मीरा समझ गई कि आग केवल छूने पर जलाती है, लेकिन प्रेम का विरह, प्रिय के दूर चले जाने के बाद भी हृदय को भीतर ही भीतर जलाता रहता है।